चंबल अंचल का प्राचीन अतिशय क्षेत्र —सिहोनिया चंबल अंचल के इतिहास में सिहोनिया पालवंश के शासकों के लिये प्रसिद्ध है। दसवीं सदी के लगभग इस सम्पूर्ण क्षेत्र में पाल वंश के शासकों का प्रभुत्व था। इस काल के पुरावशेषों से ऐसा भान होता है कि इस क्षेत्र में जैन धर्म अपनी पूर्ण पल्लवित अवस्था में…
मनुष्य लोक त्रसनाली के बहुमध्य भाग में चित्रा पृथ्वी के ऊपर पैंतालीस लाख योजन प्रमाण विस्तार वाला अतिगोल मनुष्य लोक है। इस मनुष्य लोक की ऊंचाई एक लाख योजन है। इसकी परिधि एक करोड़ बयालीस लाख, तीस हजार दो सौ उन्चास योजन (१,४२,३०,२४९ योजन) है और इसका क्षेत्रफल एक सौ आठ खरब, नौ अरब, ३…
श्रुतकेवली भद्रबाहु और उनका समाधिमरण भगवान महावीर के निर्वाण के बाद ती अर्हत् केवली गौतम, सुधर्म और जम्बूस्वामी ने संघ का नेतृत्व किया। अनन्तर द्वादशांग श्रुत के ज्ञाता विष्णु, नन्दिमित्र अपराजित गोवद्र्धन और भद्रबाहु पांच श्रुतकेवली हुए।सुयकेवलणाणी पंच जणा विण्हु नन्दिमित्तो य। अपराजिय गोवद्धण तह भद्दबाहु य संजादा। नन्दीसंघ वलात्कारगण स. ग. प्रा. पा. गोवद्र्धनाचार्य…
जिन मंदिर मुनिराजों से सुना है कि एक परावर्तन काल में ४८ मनुष्य भव मिलते हैं। जिनमें सोलह पुरुष के सोलह स्त्री के और सोलह नपुंसक के होते हैं। इनमें अनेक भव गरीबी बिमारी और तीव्र कषायमय होते है। केवल आठ भव ही ऐसे होते हैं। जिनमें मंद कषाय का उदय होता है। अर्थांत…
मूलाचार सार (१) मूलगुण अधिकार श्री कुन्दकुन्द देव अपरनाम श्री वट्टकेर स्वामी द्वारा रचित मूलाचार ग्रंथ की टीका के प्रारंभ में सिद्धान्त चक्रवर्ती श्री वसुनंदि आचार्य ने भूमिका में कहा है कि यह ग्रंथ आचारांग के आधार से लिखा गया है और आचारांग समस्त श्रुतस्कंध का आधारभूत है। ‘‘श्रुतस्कंधाधारभूतमष्टादशपदसहस्रपरिमाणं, मूलगुणप्रत्याख्यान-संस्तर-स्तवाराधना-समयाचार (समाचार)-पंचाचार-पिंडशुद्धिषडावश्यक- द्वादशानुप्रेक्षानगारभावना-समयसार-शीलगुणप्रस्तार-पर्याप्त्याद्यधिकार-निबद्धमहार्थगभीरं लक्षणसिद्धपदवाक्यवर्णोपचितं, घातिकर्मक्षयोत्पन्नकेवलज्ञान-प्रबुद्धाशेषगुणपर्यायखचितषड्द्रव्य-नवपदार्थ जिनवरोपदिष्टं,…
सोलहकारण व्रत/भावनाएँ! मेघमालाषोडशकारणञ्चैतद्द्वयं समानं प्रतिपद्दिनमेव द्वयोरारम्भं मुख्यतया करणीयम्। एतावान् विशेष: षोडशकारणे तु आश्विनकृष्णा प्रतिपदा एव पूर्णाभिषेकाय गृहीता भवति, इति नियम:। कृष्णपंचमी तु नाम्न एव प्रसिद्धा। अर्थ- मेघमाला और षोडशकारण व्रत दोनों ही समान हैं। दोनों का आरंभ भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से होता है परन्तु षोडशकारण व्रत में इतनी विशेषता है कि इसमें पूर्णाभिषेक…