प्रत्युपकार प्रथम दृश्य मंगल-प्रार्थना स्थान—रंगभूमि। समय—प्रात:। (सब मिलकर) जिनदेव का वंदन पाप को नाशे, पुण्यरतन बरसाये। जिनदेव का वन्दन।। सर्वप्रथम मैं करूँ वंदना अरहंतों की, सिद्धों की। आचार्यों की, उपाध्याय, गुरु, सर्वसाधु गुणवंतों की।। ये मंगलकारी लोक में उत्तम शरणभूत कहलायें। जिनदेव का वन्दन।। सरस्वती की करूँ वंदना, मन में आश लगा के। जिनवचनामृत के…
कृतिकर्म विधि के प्रमाण (जैन साधु एवं श्रावकों केलिए) कषायप्राभृत ग्रंथ में कहा है-जिण-सिद्धाइरिय-बहुसुदेसु वंदिज्जमाणेसु जं कीरइ कम्मं तं किदियम्मं णाम। तस्स आदाहीण-तिक्खुत्त-पदाहिण-तिओणद-चदुसिर-वारसावत्तादि-लक्खणं विहाणं फलं च किदियम्मं वण्णेदि।जिनदेव, सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय की वन्दना करते समय जो क्रिया की जाती है उसे कृतिकर्म कहते हैं । उस कृतिकर्म के आत्माधीन होकर किए गए तीन बार…
कुण्डलपुर या वैशाली: एक अनुचिंतन (मई २००२ में प्रस्तुत) -प्राचार्य नरेन्द्रप्रकाश जैन, फिरोजाबाद यह युग नई-नई खोजों का है। प्रतिवर्ष देश में कुछ नए अतिशय क्षेत्र खोज लिए जाते हैं। वैसे भी अतिशय क्षेत्रों की किसी सीमा का उल्लेख आगम में नहीं मिलता। वे असंख्य हो सकते हैं और गाव-गांव में हो सकते हैं। खोज…
मूलाचार सार छह आवश्यक अधिकार पंच नमस्कार काऊण णमोक्कारं अरहंताणं तहेव सिद्धाणं।आइरियउवज्झाए लोगम्मि य सव्वसाहूणं।।५०२।।अरिहंति णमोक्कारं अरिहा पूजा सुरुत्तमा लोए।रजहंता अरिहंति य अरहंता तेण उच्चंदे।।५०५।।दीहकालमयं जंतू उसिदो अट्ठकम्महिं।सिद्धे धत्ते णिधत्ते य सिद्धत्तमुवगच्छइ।।५०७।।सदा आयारबिद्दण्हू सदा आयरियं चरो।आयारमायारवंतो आयरिओ तेण उच्चदे।।५०९।।बारसंगे जिणक्खादं सज्झायं कथितं बुधे।उवदेसइ सज्झायं तेणुवज्झाउ उच्चदि।।५११।।णिव्वाणसाधए जोगे सदा जुंजंति साधवो।समा सव्वेसु भूदेसु तह्मा ते सव्वसाधवो।।५१२।।एवं…
चौदह धारा (त्रिलोकसार ग्रंथ के आधार से) प्रस्तुति – गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी व्यवहार काल के अन्तर्गत कुछ विशेष संख्याएँ आर्यखण्ड में नाना भेदों से संयुक्त जो काल प्रवर्तता है, उसके स्वरूप का वर्णन करते हैं। कालद्रव्य अनादिनिधन है, वर्तना उसका लक्षण माना गया है-जो द्रव्यों की पर्यायों को बदलने मे सहायक हो, उसे वर्तना…
जैन पुरातत्व और मूर्तिकला डॉ. भागचन्द्र जैन भास्कर, सदर नागपुर (महा.) पुरातत्त्व प्राचीन तत्त्वों का आंकलन है जो भूगर्भ से प्राप्त होते हैं या शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि पर रहते हैंं। साहित्यिक प्रमाणों के समर्थन में पुरातत्त्व की अहम् भूमिका रहती हैं। परम्परा, इतिहास, संस्कृति, मूर्तिकला, स्थापत्य आदि क्षेत्रों की यथार्थता के अन्वेषण से सम्बद्ध…
जिनालय, जिनदर्शन विधि एवं दर्शनपाठ( प्रश्नोत्तरी ) प्रस्तुति- बाल ब्र० कु० बीना दीदी ( संघस्थ गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी) विषय परिचय इस पाठ में जिनालय क्या, जिनालय की स्थापना क्यों, छत्र, चंवर, शिखर, घंटानाद क्यों, प्रदक्षिणा क्यों आदि बातों का सटीक समाधान देते हुए, दर्शन करते समय परिणाम कैसे, देवदर्शन की विधि एवं संस्कृत दर्शन…